Tumhare Ghar ke Pass wala Chauraha

मेरे ऑफिस से घर को जाने वाले सड़क के बीच में एक चौराहा पड़ता है। सामने वाली सड़क मेरे घर को जाती और बाए ओर वाली किसी वीराने से रास्ते को निकलती।

दाहिनी ओर कुछ दूर करीब 5-6 मकान बाद एक अपार्टमेंट हैं। 4 मंज़िल की उस अपार्टमेंट में तीसरे तल्ले पर तुम्हारा घर था।

वो घर जिनसे कई यादें जुड़ी हुई है। तुमसे मैं पहली बार ऑफिस के बाहर उस चौराहे पर ही मिला था। सुबह सुबह हल्की बारिश में कैब का इंतज़ार करती तुम और मैं बस वही पास से अपने कार से गुज़रता हुआ । तुम्हें देख कर मैंने अपनी कार की रफ्तार काम की थी । और तुम्हें अपने साथ ही ऑफिस ले गया था।

बस उस रोज से उस चौराहे पर रुकना आदत सा हो गया था। कुछ मिनट के इंतज़ार के बाद तुम आती और फिर हम दोनों साथ मे ऑफिस की ओर जाते । बारिश का मौसम था शायद , थोड़ी थोड़ी बारिश के बीच मेरे कार के रेडियो पर पुराने गाने हल्की आवाज मे बजते।

एक रोज ऑफिस से लौटते व्यक्त तुमने मुझे अपने घर पर बुलाया था। और तुम्हारी हाथ की बनी वो गरम चाय की प्याली आज भी याद है मुझे। कई यादें बन चूकी थी तुम्हारे घर से।

वो घर कुछ दिनों से खाली खाली सा है। कई बार मैं उसके नीचे से गुजर चुका हूँ मगर सन्नाटा सा पसरा है अब। ना अब कोई उस चौराहे पर कैब के लिए खड़ा मिलता ना ही किसी के हाथों की वो गरम चाय अब मिलती है। एक रोज फोन मिलाने की भी कोशिश की थी मैंने मगर तुम अब पहुच से दूर हो।

Published by Amrit Raj Karn

A Computer Science and Engineering Student with Interest In politics and Building Websites

Design a site like this with WordPress.com
Get started